8 जुलाई, 1972 को बहला, कोलकाता में जन्मे रॉयल बंगाल टाइगर “सौरव गांगुली” कल 43 वर्ष के हो गए हैं. सभी प्रशंसकों के बीच वह ‘दादा’ के नाम से भी जाने जाते हैं. वह अपने दौर में भारतीय टीम के एक सफल व् दिग्गज कप्तान रहे हैं. लेकिन आज कल अक्सर इस बात को लेकर चर्चायें गर्म रहती हैं कि आखिर “गांगुली” और “धोनी” की तुलना में बेहतर कौन…!!!

माना कि ‘धोनी’ के नाम बहुत सी उपलब्धियां है ,एक कप्तान के तौर पर उन्होंने टीम को सफलता के शिखर तक पहुँचाया हैं पर क्या वह ‘दादा’ से आगे निकल जाने के लिए पर्याप्त हैं.?

दादा-धोनी की तुलना में एक बेहतर कप्तान क्यों हैं इसके 5 कारणों पर एक नज़र-

1 . उन्होंने क्रिकेट जगत में भारतीय टीम को डूबने से बचाया.

जब 2000 में पहली बार दादा को कप्तानी सौंपी गयी तब भारतीय क्रिकेट मैच फिक्सिंग के विवादों से त्रस्त था.कथित तौर पर कई राष्ट्रीय क्रिकेटर फिक्सिंग के घोटालों में शामिल थे .और फिर उस वक़्त के कप्तान सचिन तेंडुलकर ने खराब स्वास्थ्य के कारण कप्तानी छोड़ने का फैसला किया. और उप कप्तान गांगुली को कप्तानी दी गयी. और तब उस साल भारत केन्या में आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में उप विजेता के रूप में सामने आया. दो साल बाद भारत व् श्रीलंका एक साथ एक ही प्रतियोगिता के संयुक्त चैंपियंस थे. और एक साल बाद भारतीय टीम आईसीसी क्रिकेट विश्व कप के फाइनल में पहुंची लेकिन दुर्भाग्य से फाइनल में ऑस्ट्रेलिया से हार गए.

2) उन्होंने उस वक़्त टीम के युवा खिलाडियों को एक विश्व स्तर के खिलाडी बनाया.

हम सब युवराज सिंह , हरभजन सिंह , वीरेंद्र सहवाग , वीवीएस लक्ष्मण , जहीर खान और धोनी को एक विश्व स्तर के क्रिकेटर के रूप में जानते हैं, जिन्होंने इस खेल में भारत की सफलता के लिए भारी योगदान दिया है. पहले गांगुली ने ही उनकी प्रतिभा और क्षमता को देखा और राष्ट्रीय टीम में उन्हें लेकर आये. गांगुली ने कई बार इन खिलाडियों को टीम में रखने के लिए लड़ाई भी लड़ी .

जब धोनी ने अपनी कप्तानी शुरू की तब खिलाडी पहले से ही अपने-अपने क्षेत्र में एक महान स्तम्भ के रूप में स्थापित थे. इस लिए हम कह सकते हैं कि इन खिलाडियों को मजबूत बनाने में दादा ने मशक्कत की.

3) गांगुली का बढ़िया विदेशी रिकॉर्ड रहा है.

विदेशी धरती पर गांगुली की बढ़िया सफलता रही है जिसकी कोई तुलना नहीं.गांगुली के कप्तान बनने से पहले भारत की टीम के विदेश की धरती पर रिकॉर्ड काफी कम थे. लेकिन गांगुली के कप्तानी सँभालते ही भारत के विदेशी रिकॉर्ड में सुधार होने लगा. बेशक उन्हें द्रविड़, सचिन और लक्ष्मण जैसे दिग्गजों का समर्थन था लेकिन दादा ने बहादुरी और हिम्मत से टीम का नेतृत्व किया.

जिसके परिणाम ये था कि दादा के नेतृत्व में भारत तब के विश्व चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को हराने में कामयाब रहा जो कि उस समय के दौरान सबसे बेहतरीन थे और उन्हें हराना अत्यंत कठिन काम था. उस दौरान भारत ने बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी बनाए रखने के लिए ऑस्ट्रेलिया में 1-1 से ड्रा कर दिया.

4) उन्होंने टीम का दृष्टिकोण ही बदल दिया था.

उनके निडर नेतृत्व में भारतीय टीम में काफी परिवर्तन  आया और भारतीय टीम का रवैया एक बड़े स्तर पर बदला.वो अब और अधिक आत्मविश्वास व् आक्रामक से भर गये थे जो कि साफ़ दिखाई पड़ता था. और यह कप्तान हर खिलाड़ी के अंदर एक दृढ़ विश्वास पैदा करने में सक्षम था कि वे किसी भी टीम को मात दे सकते हैं. उन्होंने युवा खिलाडियों का समर्थन किया और वरिष्ठ लोगो के साथ एक मजबूत  संबंध बनाए रखा.

5) एक भावनात्मक कप्तान.

भावनात्मक रूप से वह क्रिकेट के खेल से इतना जुड़े हुए थे कि वह मैदान में बिताये हर पल को बखूबी व् खुलकर जीते थे. दूसरी ओर धोनी एक शांत किस्म के खिलाडी हैं . हम एक ऐसे कप्तान को पसंद करते हैं जो मैदान में हो  रही हर गतीविधि में पूर्णतः शामिल रहता है.

हम भारत के नेटवेस्ट ट्रॉफी जीतने के बाद गांगुली द्वारा बालकनी में अपनी शर्ट निकाल कर उसे घुमाने वाले दृश्य को कैसे भूल सकते हैं..!!! जबकि धोनी ऐसा करने की सोच भी नहीं सकते.

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