भारतीय टेस्ट टीम के कप्तान “विराट कोहली” ने कहा है कि वह टीम के खिलाड़ियों के साथ डिसीजन रिव्यू सिस्टम (डीआरएस) के उपयोग को लेकर चर्चा करने के लिए तैयार हैं।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) शुरू से ही इसे लागू करने का विरोध करता रहा है। वेबसाइट क्रिकइंफो के अनुसार कोहली ने कहा – इसके लिए आपको बैठ कर इस विषय पर विचार करना होगा। साथ ही गेंदबाजों और बल्लेबाजों से पूछने की जरूरत है कि वह इस बारे में क्या सोचते हैं।

गौरतलब है कि नए टेस्ट कप्तान विराट के नेतृत्व में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद बांग्लादेश के खिलाफ वर्षा प्रभावित एकमात्र टेस्ट ड्रॉ रहा। तब विराट ने डीआरएस को लेकर कहा कि आपको बैठकर इस प्रणाली की समीक्षा करनी होगी। भारत ही एक मात्र ऐसी टीम है जो लगातार डीआरएस का मजबूती से विरोध करती रही है।

कोहली ने बांग्लादेश के साथ खत्म हुए टेस्ट मैच का जिक्र करते हुए कहा, हमें इस मैच के लिए आने से पूर्व बहुत कम समय मिला। अब हमारे पास समय है और मुझे विश्वास है कि इस विषय पर चर्चा होगी।

धौनी का हमेशा यह मानना रहा है कि डीआरएस फुलप्रूफ नहीं है और इसमें काफी सुधार की जरूरत है। वहीं कोहली का मानना है कि इस विवादित व्यवस्था पर बात की जा सकती है। कोहली ने कहा, आपको गेंदबाजों से पूछना होगा कि वे इसके बारे में क्या सोचते हैं। बल्लेबाजों से पूछना होगा कि वे क्या सोचते हैं। पिछले साल भारतीय टेस्ट टीम के तात्कालिक कप्तान महेंद्र सिंह धौनी ने भी डीआएस पर भारत की सोच में बदलाव के संकेत दिए थे। धौनी ने तब कहा था कि फील्ड अंपायर द्वारा पहल किए जाने के मुकाबले स्वतंत्र तरीके से अंपायर के फैसले को डीआरएस तकनीक द्वारा आंका जाना चाहिए।

कोहली ने कहा, हमारे पास अब चर्चा करने का समय है, धौनी चाहते थे अंपायर का फैसला डीआरएस तकनीक से आंका जाए.
2008 में पहली बार हुआ भारत-श्रीलंका मैच में डीआरएस का टेस्ट
2009 में आधिकारिक रूप से पाक-न्यूजीलैंड मैच में लागू किया गया
2011 में पहली बार डीआरएस का उपयोग वनडे में हुआ
2012 में एलबीडब्ल्यू संबंधी निर्णय में बदलाव किया गया
2013 में स्निकोमीटर तकनीक डीआरएस में शामिल हुई
2013 अक्तूबर में इसके प्रयोग पर बीसीसीआई ने पाबंदी लगा दी
2014 में हॉक आई की सहायता भी ली जाने लगी
2015 में कप्तान कोहली ने डीआरएस पर बात करने का संकेत दिया

आखिर क्या है डीआरएस?
तकनीक आधारित इस सिस्टम का प्रयोग मैदानी अंपायरों के विवादित फैसलों की समीक्षा के लिए किया जाता है। इससे पता चलता है कि बल्लेबाज आउट है या नहीं। शुरू में आईसीसी ने सभी अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए इसे अनिवार्य किया था लेकिन आगे चलकर इसे वैकल्पिक कर दिया गया। दोनों टीमों की सहमति से ही डीआरएस तकनीक का इस्तेमाल मैच में किया जाता है।

कैसे होता है निर्णय?
अंपायर के फैसले की समीक्षा के लिए फिलहाल तीन प्रमुख तकनीकों का प्रयोग होता है।

हॉक-आई: गेंद के प्रक्षेपण की जांच की जाती है। एलबीडब्लू की स्थिति में पता चलता है कि गेंद विकेट पर जा रही थी अथवा नहीं।

हॉट स्पॉट: इस तकनीक की मदद से पता लगाया जाता है कि गेंद ने बल्ले से संपर्क किया है या नहीं।

स्निकोमीटर: इसके जरिए विकेट के पास हल्की सी भी आवाज को सुना जा सकता है।

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