7 जुलाई 1981 को जन्मे “धोनी” आज 34 वर्ष के हो गए हैं. इसमें कोई शक नहीं कि धोनी ने अपनी काबिलियत के बलबूते पर आज ये मुकाम हासिल कर लिया है कि उनके लाखों प्रशंसक हैं जो कि सिर्फ उनके दीवाने ही नहीं बल्कि धोनी को पूजते भी हैं.

धोनी अकेले अपने दम पर ही भारतीय क्रिकेट को काफी उचाईयों पर लेकर गए. आज ये धोनी के परिश्रम का ही फल है कि भारत क्रिकेट की दुनिया में एक शक्तिशाली देश माना जाता है. धोनी का व्यक्तित्व जितना शांत है खेलने में वह उतना ही जोश भी रखते हैं. हमने मैचों में कितनी बार उन्हें धड़ाधड़ खुलकर खेलते व् चौके छक्के लगते देखा है.

कप्तान की जिम्मेवारी मिलने के बाद धोनी ने 2007 में आईसीसी विश्व ट्वेंटी 20 में भारत का नेतृत्व किया और एक जबरदस्त जीत हासिल की. धोनी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय टीम का नेतृत्व किया जिसमे की ज्यादा अनुभवी खिलाडी नहीं थे लेकिन वे सब सकारात्मकता से भरे थे. धोनी ने इसी सकारात्मक ऊर्जा का उपयोग किया और एक बढ़िया स्तर का प्रदर्शन कर जीत का स्वाद चखाया .

दक्षिण अफ्रीका में उत्तेजक जीत के बाद ऑस्ट्रेलिया में त्रिकोणीय सीरीज जीती , धोनी की कप्तानी में टीम ने काफी बेहतर प्रदर्शन किया है ख़ास कर खेल के छोटे प्रारूपों में .लेकिन एक जीत जो कि शिखर पर थी ,वो था 2011 में विश्व कप अपने नाम करना. यह एक सबसे बड़ी उपलब्धि थी. इसी तरह 2013 में इंग्लैंड में चैंपियंस ट्रॉफी भी जीती. भारत एक बार फिर टूर्नामेंट में पहुंचा लेकिन कम उम्मीदों के साथ. क्योंकि मैदान से बाहर स्पॉट फिक्सिंग के मुद्दे चल रहे थे जिसने कि आईपीएल 2013 के संस्करण को हिलाकर रख दिया था. धोनी पर भारी बोझ था, लेकिन जैसे ही टूर्नामेंट शुरू किया, चिंताएं कम होने लगी.

पहले मैच में धोनी ने सलामी बल्लेबाज के स्लॉट के लिए रोहित शर्मा को आगे रखा ,धोनी इस के इस कदम ने भारतीय पक्ष के लिए चमत्कार किया. धोनी की कप्तानी में भारत ने एक और आईसीसी ट्राफी जीत ली थी. इस प्रकार टी -20 विश्व कप , विश्व कप और चैंपियंस ट्रॉफी जीत कर धोनी एक महान कप्तान बने.

लेकिन क्या आने वाले वर्ष धोनी के लिए आशावादी लग रहे हैं..? और कब तक धोनी अपने इस करिश्मे को बनाए रखने में सक्षम होंगे..?
यह ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब धोनी के प्रशंसकों के अनुरूप शायद न हो. पिछले डेढ़ साल से धोनी का नाम धीरे धीरे धुन्दला सा होता जा रहा है.. नए खिलाडियों ने ओवरटेक करना शुरू कर दिया है. अब वह वही पुराने कप्तान नज़र नहीं आते .

जब धोनी ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया तब दर्शकों को लगा की धोनी वनडे में कहीं अधिक आक्रामक हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. टेस्ट मैचों से सन्यास के नज़दीक विश्व कप में धोनी ने फिर भी कुशलता से नेतृत्व किया. इस विश्व कप में धोनी के बारे में सबसे अच्छी बात यह रही की उसने भारी हद तक अपने तेज गेंदबाजों पर भरोसा किया था जिन्होंने इस विश्वास का फल भी दिया. लेकिन ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सेमीफाइनल में धोनी अपनी टीम के बचाव की मुद्रा में सफल नहीं रहे. और उस मैच में धोनी का सबसे ख़राब कदम अंतिम ओवर में गेंदबाज़ी के लिए मोहित शर्मा को लाना रहा.

धोनी और कोहली ( भारत के टेस्ट कप्तान ) दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले कप्तान हैं, धोनी अपने स्पिनरों पर अधिक भरोसा करता है जबकि कोहली को अपने तेज गेंदबाजों में अत्यंत विश्वास है. धोनी को शायद ही वास्तविक तेज गेंदबाजों में से किसी पर भी विश्वास है. और इस तरह दो अलग-अलग विचारधाराओं वाले कप्तान के ड्रेसिंग रूम के भीतर कुछ असंतोष होना स्वाभाविक है. यादव ने खुद ये कहा था की वह कोहली के अन्तर्गत अधिक आरामदायक तरीके से गेंदबाज़ी कर पाता है.

धोनी के बल्ले का जादू भी ख़त्म होता दिख रहा है. अब वे 4 नंबर पर बल्लेबाजी के लिए आते हैं. दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ अपने अगले वनडे मैच शुरू होने तक धोनी के पास आराम के लिए पर्याप्त समय है.और उम्मीद है वे अपनी वही पुरानी दमदार शैली के साथ लौटेंगे.

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