भारत को लेकर चीन जब-तब चिंतित रहता है। कभी अर्थव्यवस्था, कभी प्रतिभाएं, तो कभी भारतीय भू-भाग से परेशान दिखता है। अब चीन का पेट दुख रहा है कि भारत ने रियो ओलंपिक में केवल दो मेडल ही क्यों जीते? वह यहां तक कह गया, भारत में ‘खेल संस्कृति’ ही नहीं है (घूंट कड़वा, लेकिन सच है)।

चीन की लोकप्रिय वेबसाइट ‘सिना’ ने लिखा है कि सवा सौ करोड़ भारतीयों को 36 साल में बस एक गोल्ड मेडल, फिर भी कोई मलाल नहीं!

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चीन ने ऐसा कहकर हमारा मजाक उड़ाया, लेकिन हकीकत से मुंह फेरना और भी शर्मनाक होगा। भारतीय ओलंपकि संघ के मुखिया नारायण रामचंद्रन के हवाले से चाइना डेली की जो रिपोर्ट आई है, वह तो और भी बहुत कुछ कहती है। इसमें रामचंद्रन कहते हैं कि भारत के अधिकांश परिवार बच्चों को डेंटिस्ट या एकाउंटेंट बनाना पसंद करते हैं, लेकिन ओलंपिक की तैयारी नहीं कराते हैं।

रियो ओलंपिक को ही लिया जाए। भारतीय खेल मंत्रालय ने बीते दो वर्षो में ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन के लिए टारगेट पोडियम स्कीम (टॉप्स) के तहत नियत राशि 45 करोड़ रुपये की तुलना में 4 गुना ज्यादा, 180 करोड़ रुपये 100 खिलाड़ियों के लिए खर्च किए। लेकिन पदक केवल दो ही मिल पाए। यह राशि भले ही बहुत ज्यादा लगे, लेकिन 125 करोड़ की जनसंख्या के हिसाब से नाकाफी है।

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हमें अमेरिका से इस बारे में सीखना होगा। जहां उसने रियो ओलंपिक के लिए 2012 की तुलना में 13 प्रतिशत बजट बढ़ाया। 2014 में ही उसने 227 खिलाड़ियों को चुन लिया था। पहले सत्र में चयनित 1500 खिलाड़ियों पर वहां 22 मिलियन डॉलर खर्च किए गए, जो साल भर प्रति खिलाड़ी की दर से 35 हजार डॉलर होता है।

इसी तरह दूसरे नंबर पर ब्रिटेन रहा, जिसने 2008 के बीजिंग ओलंपकि के बाद की तैयारियों में 16 प्रतिशत का इजाफा किया और नतीजा सामने है। वह 2012 में तीसरे और 2016 में दूसरे क्रम पर आ गया।

यदि खेलों में खर्च की बात करें तो अमेरिका में 22 रुपये, ग्रेटर एंटीलिज पर स्थित छोटे सा द्वीप जमैका, 234 किमी लंबा और चौड़ाई केवल 80 किमी और कुल क्षेत्रफल 11,100 वर्ग किमी, जनसंख्या 2,804,852 वहां भी प्रति व्यक्ति की दर से 19 पैसे खर्च किए जाते हैं। लेकिन भारत, जिसका कुल क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी, जनसंख्या लगभग 130 करोड़, विश्व का सातवां सबसे बड़ा देश है, खेल पर प्रति व्यक्ति खर्च केवल 3 पैसे। जाहिर है सब कुछ साफ है और सामने है कि हमारे यहां खेलों की क्या स्थिति है?

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तमाम रिपोर्ट व आंकड़े देखने के बाद भी यदि भारत में खेलों के प्रति माहौल नहीं बना तो फिर भारत का, भविष्य का दावा भी झूठा पड़ जाएगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में खेलों में भ्रष्टाचार, राजनीति और भाई-भतीजावाद बुरी तरह से हावी है।

रियो ओलंपिक की एक और शर्मनाक हकीकत ने देश को लज्जित किया है। महिला मैराथन स्पर्धा खिलाड़ी ओपी जैयशा का खुलासा बेहद चौंकाने वाला है। उन्हें एनर्जी ड्रिंक, खाना-पीना तो दूर पानी तक नसीब नहीं हुआ। वहां भारत के स्टाल तो थे पर खाली थे।

लगातार दौड़ से डिहाइड्रेशन के चलते वो बेहोश भी हुईं, उन्हें लगा कि मौत हो जाएगी। वहां इसी सवाल पर ओलंपिक दल के लोग कुछ बोल नहीं पाए। अब जरूर जांच की बात हुई है, सफाई आ रही है। लेकिन जो होना था हुआ, शर्मनाक था।

कुछ ऐसा ही खुलासा हांगकांग के साउथ चाइना मार्निग पोस्ट ने करते हुए 2008 ओलंपिक में 10 मीटर हवाई राइफल पुरुष प्रतियोगिता की व्यक्तिगत निशानेबाजी में गोल्ड मेडलिस्ट अभिनव बिंद्रा को भी सरकारी मदद न मिलने की है।

बहरहाल, चीन की चिंता कहें या मजाक, हमारी तो असल हकीकत यही है कि भारत में खेलों के प्रति माहौल नहीं है। नीतियां बहुत हैं, लेकिन क्रियान्वयन सही नहीं हैं। हमें सभी खेल नीतियों की समीक्षा करनी होगी। पूरे देश में प्राइमरी शिक्षा स्तर से ही सरकारी और निजी पाठशालाओं से प्रतिभाओं का चयन करना होगा।

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इतना ही नहीं, ग्रामीण स्तर पर ग्राम पंचायत के जरिए भी उन प्रतिभाओं को तलाशना होगा जो किसी कारण, तमाम शैक्षणिक माहौल के बावजूद पढ़ने से वंचित रह जाते हैं, लेकिन उनमें भी गजब की खेल प्रतिभा होती है। अपने दम-खम पर मेडल लाने वालों को सिर आंखों पर बिठाना अच्छा है, होना चाहिए।

उन्हें पुरस्कृत करना भी ठीक है। लेकिन पर्दे के पीछे की इनकी सच्चाई को भी स्वीकारना होगा। उन प्रतिभाओं को ढूंढ़ना ही होगा जो खेलों में हमारे लिए काफी कुछ कर सकते हैं। समय की यही पुकार है, वरना विश्व की नंबर एक आबादी वाला चीन नंबर दो आबादी वाले भारत को यूं ही लजाता रहेगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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