indian cricket team
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क्रिकेट की हालिया सूरत में एक फ़ॉर्मूला कई टीमों को रास आ रहा है. जिसे भारतीय क्रिकेट टीम को भी अमल में लाना चाहिए, बल्कि इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की टीम के प्रदर्शन पर तो इस फ़ॉर्मूले का असर भी देखा जा सकता है. ये फ़ॉर्मूला कुछ और नहीं बल्कि खेल के अलग-अलग प्रारूप में अलग-कप्तान रखने का फ़ॉर्मूला.

इंग्लैंड ने वन-डे में इयॉन मॉर्गन और टेस्ट में जो रूट को तो वहीं ऑस्ट्रेलिया ने वन-डे में आरोन फ़िंच और टेस्ट मैच में टिम पेन को कप्तान बना कर अपनी-अपनी क्रिकेटिंग स्ट्रैटेजी को मैदान पर एक बेहतर तरीके से एक्ज़ैक्यूट किया है.

इस फ़ॉर्मूले की चर्चा भारतीय क्रिकेट टीम के परिप्रेक्ष्य में और ज़्यादा अहम हो जाती है, क्योंकि कुछ विराट पर कप्तानी की बढ़ती ज़िम्मेदारी का असर कहीं न कहीं अब एक नकारात्मक और बोझिल सी तस्वीर में नज़र आने लगा है. तो चलिए बात की जाए क्या होना चाहिए अलग-अलग फ़ॉर्मैट में टीम इंडिया कप्तानी का फ़ॉर्मूला और क्या हैं उसकी मुख्य तीन वजह.

विराट पर बढ़ता दवाब

भारतीय क्रिकेट टीम

भारत जैसे एक बड़े देश में जहाँ क्रिकेट को एक धर्म माना जाता हो, और क्रिकेटर के तौर पर करोड़ों उम्मीदों का भार आपको लेकर चलना हो. उस देश की क्रिकेट टीम का कप्तान होना अपने आप में एक बहुत ही बड़ी ज़िम्मेदारी है. इसी ज़िम्मेदारी को कप्तान विराट कोहली बीते कुछ सालों से निभाते आ रहे हैं. जिसमें उन्हें काफ़ी उतार-चढ़ावों का भी सामना करना पड़ा जो कि खेल का एक हिस्सा भी है.

लेकिन तेज़ी से इवॉल्व होती मॉडर्न क्रिकेट में कहीं न कहीं वो समय आ चुका है. जब एक खिलाड़ी के तौर पर विराट कोहली के प्रदर्शन में इस ज़िम्मेदारी का दवाब नज़र आने लगा है. वहीं दूसरी ओर टेस्ट मैचों में कप्तान के तौर पर विराट ने काफ़ी अच्छे तरीके से अपनी ज़िम्मेदारी निभाई है. अब बात ये है कि अगर विराट के ऊपर से दवाब कम करना है तो सीमित ओवरों की कप्तानी रोहित शर्मा दे देने में ही टीम और खिलाड़ी सबकी भलाई है.

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